अब्दुल बासित की रिपोर्ट
लखनऊ: मुस्कुराइए कि अब आप उस लखनऊ में हैं जहाँ की फिजाओं में इत्र की खुशबू नहीं, बल्कि बारूद की गंध बसने लगी है। जिस शहर ने दुनिया को तहजीब का सलीका सिखाया, जहाँ गालियों की जगह भी अदब ने घेर रखी थी, आज उस नवाबी पहचान पर अपराधियों के जूतों के निशान साफ देखे जा सकते हैं। अब यहाँ सड़कों पर पहले आप की सदाएं नहीं, बल्कि कट्टों की तड़तड़ाहट सुनाई देती है।
ताजा मिसाल आज की ही ले लीजिए, जहाँ आपसी रंजिश के पुराने ड्रामे में भाजपा युवा मोर्चा के नेता चेतन को दो गोलियों का नजराना पेश कर दिया गया और वे ट्रॉमा सेंटर पहुंच गए। यह कोई पहली बार नहीं है, इस साल की शुरुआत से ही लखनऊ के हर कोने से खौफ की ऐसी ही खबरें आ रही हैं। कभी रील बनाने के चक्कर में सरोजनी नगर में एक मासूम की जिंदगी का द एंड हो जाता है, तो कभी आशियाना में शिक्षा के बोझ तले दबा बेटा अपने ही बाप के वजूद के टुकड़े-टुकड़े कर देता है। गोमती नगर के सामुदायिक केंद्रों में अब शादियां तब तक मुकम्मल नहीं मानी जातीं, जब तक हर्ष फायरिंग में किसी बेगुनाह का सीना छलनी न हो जाए।
आज के लखनऊ में किसी इंसान की जान की कीमत सड़क किनारे उगे घास-फूस से ज्यादा नहीं रह गई है, जब चाहा, जिसे चाहा, साफ कर दिया। अपराधी इतने बेखौफ हैं मानो उन्हें पुलिस कमिश्नरी का डर नहीं, बल्कि आशीर्वाद प्राप्त हो। पुलिस की मुस्तैदी का आलम यह है कि शहर में बम और बारूद का रमसा मचा हुआ है और खाकी शायद किसी गहरी नींद में नफासत के ख्वाब देख रही है। जिस राजधानी में कभी सालों तक सन्नाटा रहता था, वहां अब हर रोज गोलियों का शोर एक नया रिवाज बन गया है।